Spiritual Seminar: बी एच यू मे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर आध्यात्मिक संगोष्ठी सम्पन्न
Spiritual Seminar: संगोष्ठी मे बाबा रामदेव, स्वामी चिदानंद सरस्वती, अवधेशानंद गिरी सहित कई कई महत्वपूर्ण संत, आचार्य एवं विद्वत जनों की रहीं उपस्थिति
- अवसर पर वीडियो कांफ्रेंस के द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया सम्बोधन
रिपोर्ट: डॉ राम शंकर सिंह
वाराणसी, 12 मई: Spiritual Seminar: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026” के अंतर्गत मंगलवार को स्वतंत्रता भवन में “आध्यात्मिक संगोष्ठी” का आयोजन किया गया। यह आयोजन संयुक्त रूप से संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित किया गया। भक्ति, श्रद्धा एवं संस्कृति पर केंद्रित इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न भागों से संत, आचार्य सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के कुलपति एवं शिक्षाविदों ने भी सहभागिता की।
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📲 WhatsApp पर शेयर करेंमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्चुअल संबोधन में कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारतीय सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक परंपरा और राष्ट्रीय आत्मगौरव का प्रतीक है। सोमनाथ, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और भारतीय आस्था, श्रद्धा एवं सांस्कृतिक एकता का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। सोमनाथ मंदिर इस बात का प्रतीक है कि किसी राष्ट्र की आत्मा को कभी पराजित नहीं किया जा सकता। आज जब पूरा विश्व अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब भारत का आध्यात्मिक संदेश विश्व मानवता के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि किसी भी समाज, विश्वविद्यालय अथवा राष्ट्र के विकास के लिए आत्मविश्वास और स्वाभिमान अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि त्रिकोणमिति, ज्योतिष, गणित, संगीत एवं धर्मशास्त्र सहित अनेक क्षेत्रों में भारत ने विश्व को महत्वपूर्ण ज्ञान दिया है। आवश्यकता इस बात की है कि इन पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक संदर्भों के साथ जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए, ताकि भारतीय चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टि दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके।

अध्यक्ष स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज, आचार्यमहामंण्डलेश्वर, जूना अखाड़ा, हरिद्वार ने कहा कि आज विश्वभर में आयुर्वेदिक औषधियों, योग और भारतीय संस्कारों के प्रति गहरा उत्साह दिखाई दे रहा है, क्योंकि भारतीय संस्कृति केवल भौतिक संपदा प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य को उससे ऊपर उठकर आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर होने का मार्ग भी प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि भारत ऐसी सनातन संस्कृति का उपासक है जो नित्य, शाश्वत और अमिट है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय संस्कारों और सांस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण विश्वविद्यालयों के माध्यम से ही संभव होगा, क्योंकि शिक्षण संस्थान नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान और जीवन मूल्यों से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं।
योग ऋषि स्वामी रामदेव अपने कहा कि भारत की धर्मशक्ति, उसके जीवन-मूल्य और आदर्श केवल भौतिकता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे आध्यात्मिक चेतना और मानवीय उत्थान पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ने सदैव जीवन मूल्यों को सर्वोपरि रखा है और यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। स्वामी रामदेव ने कहा कि भारत की संत परंपरा और ऋषियों की तपस्या हमारी संस्कृति के मूल केंद्र हैं, जिन्होंने सदैव समाज को ज्ञान, संयम और मानवता का मार्ग दिखाया है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि यह आयोजन सनातन स्वाभिमान का पर्व है। उन्होंने इस अवसर पर देवी अहिल्याबाई होल्कर, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा महामना पंडित मदन मोहन मालवीय सहित उन महान विभूतियों का स्मरण किया, जिनके अटूट संकल्प और योगदान ने भारतीय सभ्यता एवं सांस्कृतिक धरोहरों के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।जगद्गुरु वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर जी महाराज ने युवा शक्ति के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि युवाओं में ऐसी अपार ऊर्जा और क्षमता निहित है, जो विश्व स्तर पर बड़े परिवर्तन लाने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों में भी युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण का प्रमुख आधार माना गया है तथा सदैव उसे ज्ञान, अनुशासन और सेवा के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा दी गई है।
मिथिलेश नन्दिनी शरण, सिद्धपीठ हनुमान्निवास, अयोध्या ने सोमनाथ के ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व पर चर्चा करते हुए कहा कि पुराणों के अनुसार चन्द्रदेव की कठोर उपासना से भगवान शिव प्रसन्न हुए थे और इसी कथा से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का विशेष संबंध स्थापित होता है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आस्था, श्रद्धा और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती ने “मंदिर केन्द्रित अर्थव्यवस्था” की अवधारणा पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत में करोड़ों लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मंदिरों और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों पर आधारित है।
प्रो. श्रीनिवास वरखेडी, कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने कहा कि भारत का इतिहास हजारों वर्षों पुराना एवं अत्यंत समृद्ध रहा है। उन्होंने कहा कि स्वाभिमान पर्व के अवसर पर हमें अपने गौरवशाली इतिहास का स्मरण करने के साथ-साथ अपने नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक आदर्शों और मानवीय परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए। प्रो. ए.के. त्यागी, कुलपति, महात्मा गान्धी काशी विद्यापीठ ने कहा कि भारतीय सभ्यता में संत समाज ने सदैव समाज और राष्ट्र को मार्गदर्शन प्रदान किया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत को “ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था” की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है, जिसमें शिक्षा, शोध और भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका हो।
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प्रो. बिहारीलाल शर्मा, कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि भारतीय जीवन-मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और सनातन विचारों का पुनः उत्सव मनाया जा रहा है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यंत सकारात्मक संकेत है। प्रो. मुरली मनोहर पाठक, कुलपति, श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत वि.वि., नई दिल्ली ने सोमनाथ मंदिर तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण की भावना का उल्लेख करते हुए संस्कृत श्लोकों का सस्वर पाठ किया। उन्होंने सोमनाथ के पुनरुत्थान के पीछे निहित भारतीय आत्मा, स्वाभिमान और सांस्कृतिक शक्ति का भावपूर्ण वर्णन किया तथा कहा कि भारतीय सभ्यता की यही जीवंत चेतना उसे सदैव पुनर्जीवित और सशक्त बनाती रही है।
आयोजन के समन्वयक प्रो. ब्रजभूषण ओझा, मानित व्यवस्थापक, श्री विश्वनाथ मंदिर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तथा सह-समन्वयक प्रो. विनय कुमार पाण्डेय, समन्वयक, वैदिक विज्ञान केन्द्र रहे। कार्यक्रम में प्रो आशीष बाजपेई निदेशक प्रबंध शास्त्र संस्थान, प्रो. रंजन कुमार सिंह, छात्र अधिष्ठाता तथा प्रो. सुषमा घिल्डियाल, संकाय प्रमुख सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक उपस्थित रहे।

