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“वो दिन बचपन के”(those days of childhood) यादों में वाजिद हुसैन “साहिल” की शब्द रचना; दिल को छूने वाली

those days of childhood: “वो दिन बचपन के”

Wajid Husain
वाजिद हुसैन “साहिल”,सेंधवा ज़िला बड़वानी
मध्य प्रदेश

those days of childhood:

गुल भी कुछ कम नहीं बचपन में खिलाए हमने
बोर भी पेड़ से खुद तोड़ के खाए हमने
नोट कागज़ के बनाकर है लुटाए हमने
है पतंग चीज़ क्या भिंगरू भी उड़ाए हमने

दिन वो अनमोल थे जो बीत गए जीवन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

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अपने हाथों से गिलौलें भी बनाई हमने
और देखी थी कभी चांद में माई हमने
मौज मस्ती भी की और मार भी खाई हमने
नाव कागज़ की भी बारिश में चलाई हमने

खुद ही शैदा थे बहुत, हम भी जब अपने फन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

अब कहां है मेरे बचपन का वो गिल्ली डंडा
चोर चिट्ठी है कहां, जिसमे मिला था अंडा
सच उगलवाने का उस दौर का था ये फंडा
झूठ बोलोगे तो हो जाएगा अंडा बंडा

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याद आते है बहुत खेल वो घर आंगन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

क्या हसीं पल थे जो बचपन में बिताए हमने
ख्वाब परियों के जब आंखों में बसाए हमने
किस्से नानी से सुने सबको सुनाए हमने
गारे मिट्टी से खिलोने भी बनाए हमने

कितने सपने तो अधूरे ही रहे थे मन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

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अपने जख्मों की दवा खुद ही बना लेते थे
चोट लगती थी तो मिट्टी ही लगा लेते थे
नद्दी और खेत में दिन पूरा बिता लेते थे
कभी डंगरे कभी भुट्टे का मज़ा लेते थे

और थकते भी न थे जिस्म थे क्या आहन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

शोर हर शाम परिंदो का हुआ करता था
ऐसा मंजर था जो मन मोह लिया करता था
घर के आंगन में ही बिस्तर भी लगा करता था
लेटे लेटे ही में तारों को तका करता था

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पेड़ से आती थी जब ठंडी हवा छन छन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

मार स्कूल में जब दोस्त कोई खाता था
टाट पट्टी में भी गद्दे का मज़ा आता था
ज़ह्न में आज भी ताज़ा है कहानी वां की
चांदनी नाम की, बकरी थी जो अब्बू खां की

हम भी जब फूल थे, स्कूल के उस गुलशन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

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अंधे, लंगड़े की कहानी भी है मन में ताज़ा
अलगु, जुम्मन की कथा और वो चौपट राजा
रानी, झांसी की थी और पुष्प की थी अभिलाषा
सब किताबों में जो आसान थी हिंदी भाषा

थे गणित के तो सवालात ही सब उलझन के
काश फिर लौट के आ जाए वो दिन बचपन के

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