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Economy: बेचान, निजीकरण नही: पूजा आर झीरीवाल

Economy: अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास करते हैं । महत्वपूर्ण रूप से अर्थव्यवस्था दो प्रकार की होती है । पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और दूसरी समाजवादी अर्थव्यवस्था। दोनों में से कोई भी अर्थव्यवस्था गलत नहीं है । व्यक्तिगत रूप से भी और एक देश के रूप में भी। फिर गलत क्या है ? क्यों कोई देश विकसित श्रेणी में है और क्यों कोई देश अविकसित। उसका कारण यही है कि देश ने अपनी स्थिति के अनुसार अर्थव्यवस्था का चयन नहीं किया है। देश को अपनी स्थिति के अनुसार अर्थव्यवस्था का चयन करना चाहिए । दूसरे देश की नकल करके नहीं । वहीं इससे विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

पहले हम बात करते हैं विकसित देश की। जैसे कि अमेरिका, फ्रांस, नीदरलैंड, यूके आदि । विकसित देशों में जीडीपी पर कैपिटा $60000 से अधिक है । इनका जीवन स्तर उच्चस्तरीय है। बेरोजगारी का प्रतिशत यहांँ पर 3 प्रतिशत या उससे भी कम है । ये देश कृषि प्रधान देश नहीं है क्योंकि इनका भोजन कृषि आधारित नहीं है । यहाँ इनकम सोर्सेस मुख्य रूप से सर्विस सेंक्टर और मेनुफेक्चरिग है। किन्तु यहाँ कृषि क्षेत्र को भी बहुत प्रोत्साहित किया जाता है। कृषको को बड़े ऋण दिए जाते हैं और अगर फसल खराब होती है तो ऋण ना केवल माफ किए जाते हैं बल्कि हर महीने सैलरी भी सरकार द्वारा दी जाती है।

यह वह कल्याणकारी योजना है जिसके लिए जनता सरकार बनाती है। यह वह आधार है जो देश को विकसित देश की श्रेणी में रखता है । जापान की अगर बात करें तो यह भी एक विकसित देश है। विकसित देश की व्यवस्था को एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि वहाँ पर लोगों की स्थिति बहुत ही उच्च है । जैसे वहाँ अगर कोई एक महिला अकेली रहती है तो उसको सरकार की तरफ से फ्री हाउसिंग फैसिलिटी दी जाती है । यह सरकारी खर्चे पर है । सरकार लाभ की स्थिति में है । सरकार विकसित है । इसलिए इस प्रकार की सुविधा प्रदान की जाती है ।
दूसरी ओर इसके विपरीत भारत जिसमे आय का मुख्य साधन कृषि है और कमोबेस 60 प्रतिशत जनसंख्या गाँव में निवास करती है।

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यहाँ शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है ।लगभग 44 परसेंट लोग आज भी अशिक्षित हैं । यहाँ पर कुपोषण की अगर हम बात करें भारत में कुपोषण का आकड़े डराने वाले है। कुपोषण मे भारत 116 देशों में नीचे से 101 नंबर पर है । इस प्रकार यह माना जा सकता है कि भारत एक विकासशील देश की श्रेणी में रहा था लेकिन अभी यह देश अविकसित देश की श्रेणी में होने की कगार पर है । साथ ही देश में जीडीपी का स्तर भी लगातार गिर रहा है। यहाँ जीडीपी पर कैपिटा लगभग $1900 है ।

यह महत्वपूर्ण है कि अर्थशास्त्र का प्रयोग देश की स्थिति के अनुसार किया जाता है । विकसित देश जहाँ पर व्यक्तियों के बीच गरीबी और अमीरी की खाई नहीं है । सभी स्तरयुक्त जीवन जी रहे हैं । वहाँ निजीकरण को उपयोग में लिया जा सकता है क्योंकि वहांँ निजीकरण में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा है । जबकि भारत जैसे देश में जहांँ अमीरी -गरीबी के बीच एक महत्वपूर्ण रूप से गहरी खाई है। वहाँ एक ओर गरीब लोगों के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व है कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कम दर पर करें । और यह सरकारी क्षेत्र के उद्योग स्थापन से ही संभव हो सकता है क्योंकि सरकारी उद्यमिता का मूल उद्देश्य धन कमाना ना होकर देश की गिरी हुई व्यवस्था को स्तर पर लाने संबंधी कल्याणकारी भूमिका में होना है।

दूसरी ओर जो सरकारी क्षेत्र के उद्यम को बंद कर उन्हें निजी हाथो में सौंप दिया जाये तो कुछ धनीलोग ही मालिक होकर रह जाएंगे । क्योंकि भारत मे निजी क्षेत्र में विकसित देशों के समान प्रतिस्पर्धा नहीं है । प्रतिस्पर्धा का ना होना है एकाधिकार को जन्म देता है जो कि देश को अमीरी- गरीबी की खाई की ओर धकेलता है। यह एक देश के संदर्भ में विश्लेषण है। अगर किसी देश के नागरिकों के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए तो धनी /पूंजीपति लोग निजी अर्थव्यवस्था (Economy) का समर्थन करेंगे क्योंकि उनको एकाधिकार और लाभ मिलने वाला है ।जबकि गरीब लोग सरकारी उद्योगों की व्यवस्था के पक्ष में होंगे ।कारण अभी उनका आधारभूत विकास भी नहीं हुआ है।

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अब एक महत्वपूर्ण चर्चा यह है कि निजीकरण क्या है ?अर्थशास्त्र की दृष्टि से भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था(Economy) को ग्रहण करता है। जहाँ भारत में कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र को छोड़कर पूरी तरह निजीकरण की व्यवस्था को अपना चुका है । यह व्यवस्था देश में पूर्व से ही हैं कि कुछ क्षेत्र जो देश के सभी नागरिक के कल्याण व मूलभूत प्रयोग से जुड़े व महत्वपूर्ण है जैसे रेलवे, एयर, पेट्रोलियम, सेना आदि। इन उपक्रमो को सरकारी क्षेत्र में रखा गया है, जहाँ पर 51% या अधिक पूंजी आधिपत्य सरकार के द्वारा रखा जाता है।

अगर देश के ये आधारभूत उपक्रम हानि की स्थिति मे चल रहे है तो सरकार प्रतिस्पर्धा हेतु निजी क्षेत्र के लिए इन क्षेत्र को खोल सकती है अर्थात नये उपक्रम लगाये जा सकते है। यही निजीकरण है। लेकिन आज जो किया जा रहा है वह निजी करण नहीं है । आज सरकारी संपत्ति को का बेचान किया जा रहा है। हमारा संविधान सरकारी संपत्ति की सुरक्षा का अधिकार देता है किंतु यह ना केवल सरकारी संपत्ति को नुकसान हो रहा है बल्कि उसकी अस्तित्व को खत्म कर दिया जा रहा है। यह ना तो अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण के अनुसार निजीकरण है बल्कि यह एक बेचान है और संविधान के अनुसार भी असंवैधानिक है।

हम इस देश की सम्पति के लगातार बेचान के क्रम को आगे इस प्रकार समझ सकते है। और कुछ क्षेत्रों के बारे में बात करते हैं । सबसे पहले आता है रेलवे । 2014 में जब सरकार बदली तो उसी समय रेलवे बजट प्रस्तुत नहीं किया गया बल्कि सामान्य और रेलवे बजट को साथ में प्रस्तुत किया । जिससे दोनों के बजट की हानियों को एक दूसरे के साथ सैटऑफ कर दिया गया और कौन सा बजट हानि में चल रहा है यह विश्लेषण करने में देश को एक महत्वपूर्ण रूप से गुमराह किया गया । और इसके बाद रेलवे को बेचा जा रहा है । इसमें किसी प्रकार की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है ।कुछ देश के धनी वर्ग इसे अपनी उद्यमिता मे शामिल कर रहे है और एकाधिकार की स्थिति में ले जाया जा रहा है ।एकाधिकार की स्थिति में सर्वप्रथम परिणाम, सुविधाओं का मूल्य बढ़ाकर प्राप्त होता है।

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उसी प्रकार हाल ही में एयर इंडिया को भी बेचान शतप्रतिशत कर दिया गया है । सरकार यह निजीकरण ना करके देश की संपत्ति को बेच रही है। क्योंकि पहले से ही इस क्षेत्र का निजीकरण हो चुका है। किन्तु सरकार सरकारी एयरलाइंस जो लाभ मे चल रही है उनमे डिसइनवेस्ट करके निजी उद्योगपतियो को बेच रही है। यह मनमाना कार्य देश हित मे नही है।

 Economy

Economy: पूर्व बजट में घोषणा की गई है कि सरकार पीएसयू का भी बेचान करने का विचार कर रही है । सरकार ने 2014 से 2019 में 279622 करोड़ रुपए का डिसइनवेस्टमेंट किया है, जो कि अभी तक का एक बहुत बड़ा डिसइनवेस्टमेंट है । भारत में 10 महारत्न वे 14 नवरत्न कंपनीज है जोकि महत्वपूर्ण रूप से देश की व्यवस्था को संभाले हुए हैं । भारत सरकार इनमें डिसइनवेस्टमेंट करके इन्हें प्राइवेट सेक्टर में बेचने की दिशा में रत है । सरकार हर प्रकार से अपना कोष बढाना चाहती है किंतु देश की संपत्ति बेचकर बिल्कुल देश को बर्बाद करने जैसा है । लाभ प्रद उद्यमिता का बेचान करने से ये पूंजीपति को ही बडा लाभ देगी। और देश अपना रेवेन्यू हमेशा के लिए खो देगा।

सरकार ने 2017 में एक आॅडोप्ट आर्किटेक्चर स्कीम की घोषणा की है जिसने पूरे भारत में से लगभग 250 के करीब मॉन्यूमेंट्स का बेचान सरकार प्राइवेट सेक्टर को कर रही है । यह देश की संपत्ति है इसका बेचान करके सरकार अपना फंड बना रही है । बात की जाए तो भारत में बैंकों की। भारत मे बैंको के राष्ट्रीयकरण से पहले निजी बैंको की भरमार थी। किन्तु ये बैक जनता का शोषण करने मे लगे थे। लोग कर्ज में डूब कर मरने लगे । और प्राइवेट बैंकिंग सेक्टर मनमानी वसूली कर रहे थे । लोग आत्महत्या करने लगे थे।

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Economy: तब माननीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने बैंकिंग सेक्टर का राष्ट्रीयकरण किया । उस समय बैंक के मालिको ने इसका विरोध किया । कारण स्पष्ट था कि उनका लाभ कम होने वाला था । जैसा कि कहा गया है कि गलत कुछ नहीं है राष्ट्रीयकरण से गरीबों का कल्याण संभव है । निजी क्षेत्र शोषण हेतु कार्य करता है क्योंकि उद्देश्य लाभ है । किंतु तात्कालिक पीएम ने कल्याण का मार्ग चुना।उस समय लोग बैंकिंग सेक्टर पर विश्वास नहीं करते थे इसलिए घर पर अधिकतर पूंजी रखी जाती थी । आज भारत में बैंक पर विश्वास किया जाता है । यह विश्वास बड़ी मुश्किल से बना है और इसमें बहुत सारे सालों को लगाया गया है ।

2014 में वित्त मंत्री ने बजट में घोषणा की कि बैंकिंग क्षेत्र में सरकारी बैंक को निजी पूंजीपतियो को बेचान किया जायेगा। शुरूआत कर दी गई है। आईडीबीआई बैंक को निजी किया जा चुका है । और इसके अलावा अन्य बैंक लाइन में लगे हैं ।

इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत सरकार द्वारा जो किया जा रहा है इसमें देश ने विकास की उल्टी राह पकड़ ली है ।

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यद्यपि बात बेचान की हो रही है। निजीकरण और बेचान मे पर्याप्त अंतर है । किंतु यह बेचान निजीकरण के नाम पर किया जा रहा है । जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था (Economy) प्रारंभ से ही मिश्रित अर्थव्यवस्था (Economy) रही है । यहाँ कुछ क्षेत्रों को छोड़कर सभी क्षेत्रों में कोई भी व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। बेचान की स्थिति तब आती है जब कोई उद्यम हानि में चल रहा है। लेकिन जिन भी सेक्टर का बेचान किया जा रहा है वह अधिकतम लाभ की स्थिति में है । क्योंकि उन पर सामूहिक रूप से देश की सरकार ने 70 सालों से काम किया है । अब यह लाभ कमाने वाले उपक्रम कुछ बड़े उद्योगपति घरानों को बेचे जा रहे हैं। जहाँ इन्हें प्रतिस्पर्धा करने वाला कोई नहीं है।

उद्योगपति घरानों की कुल संपत्ति में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि का मुख्य कारण भी यही रहा है । अडानी जो कि एक गुजरात के उद्योगपति हैं इनकी 2014 में संपत्ति 35 हजार करोड़ थी जबकि यह अब बढ़कर लगभग 9.47 लाख करोड़ हो गई है । इसी तरह अन्य बड़े उद्योग घराने भी इसी तरह से लाभान्वित हो रहे हैं। इससे भारत की गरीबी -अमीरी की खाई लगातार बढ़ रही है। इसलिए भारत आज एक अविकसित देश घोषित होने के कगार पर है।

सरकार को इस हेतु जवाब देने चाहिए कि इस तरह से
-देश की स्थाई संपत्ति को बेचने की क्यों आवश्यकता हुई ?
-इस तरह से बेचन का धन का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है ?
-इस बेचान का अंत किस स्तर पर होने वाला है?
– तथा भविष्य में भारत की समस्त संपत्तियों का बेच दिया गया तो भारत के कोष में धन कैसे जमा होगा?
क्या भारत के राजकोष मे धन केवल कर के माध्यम से आएगा ?

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इससे करो कि सीमा तो बढ़ जाएगी । वसूली आम व्यक्ति से वस्तु और सेवा के मूल्य में वृद्धि करके की जाएगी । इसका एक उदाहरण जीएसटी की दरों का 30% से ज्यादा होना है। इससे देश की सामान्य जनता का उपभोग स्तर निम्नतम पैमाने पर आ जाएगा। भुखमरी व कुपोषण की स्थिति पैदा होगी। इससे आत्महत्या, बीमारी व जनता में आक्रोश उत्पन्न होगा । फिर क्या निजी क्षेत्र इस स्थिति को संभाल पाएंगे।

यह तो पूरा भारत के अर्थशास्त्री या विश्व के अर्थशास्त्री भी जानते हैं कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था (Economy) को नहीं समझ सकते हैं । लेकिन उनका एक स्टेटमेंट “सरकार उद्योगों को चलाने के लिए नहीं है”। इसी सिद्धांत के आधार पर पूरी भारत की व्यवस्था कार्य कर रही है। जो कि देश के भविष्य को गर्त में डालना है । इससे उभरने के लिए तीन पीढ़ी भी कम पड़ जाएगी । अतः जनता को जागरूक होने की आवश्यकता है । और इस विनिवेश करके बेचान को रोकना जरूरी है। (यह लेखक का अपना विचार है।)

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