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Important language questions: भाषा के जरूरी सवाल: गिरीश्वर मिश्र

important language questions: नागरिक-जीवन, व्यापार-वाणिज्य, प्रशासन, न्यायिक व्यवस्था और शिक्षा सार्वजनिक महत्त्व के ऐसे जीवन-क्षेत्र हैं जिनमें भाषा बड़ी अहम किस्म की भूमिका निभाती है. साथ ही अब सभी मानते हैं कि समाज में शिक्षा को सब तक पहुंचाना देश की मानव-क्षमता के पूर्ण और प्रभावी उपयोग के लिए बेहद जरूरी है. यह सब सही भाषा नीति से हो सकेगा क्योंकि संचार और शिक्षा के लिए वही सबसे समर्थ माध्यम है.

यह अवश्य है कि भारत की एकता भाषा पर ही नहीं टिकी है परन्तु प्राचीन इतिहास में भाषिक विविधता राष्ट्रीय एकता के रास्ते कभी बाधा रही हो ऐसा उल्लेख नहीं मिलता. भाषिक चर्या के इतिहास के निकट जाने पर यही पता चलता है कि विभिन्न भाषाओं की विषयवस्तु में आश्चर्यजनक रूप से बहुत अधिक साझेदारी और समानता है और इस तथ्य से रूबरू होना या उसे सबके सामने उपस्थित करना जरूरी है. साथ ही जनजातीय और लुप्तप्राय भाषाओं और मातृभाषाओं के संरक्षण, विकास और प्रोत्साहन की भी जरूरत है. स्वतंत्र भारत में भाषाओं के विभिन्न संस्थानों के बीच ताल-मेल बिठाना भी जरूरी है ताकि वे उन लक्ष्यों को पा सकें जिनके पाने के लिए वे बनाए गए थे.

विद्यालयों में कितनी भाषाएँ सिखाई जानी चाहिए इस प्रश्न का उत्तर क्षेत्र-विशेष की जरूरत पर निर्भर करेगा. देखने पर पता चलता है कि ‘त्रिभाषा-सूत्र’ विभिन्न राज्यों में अलग-अलग ढंग से लागू हुआ है और उसमें वस्तुत: संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा के अध्ययन की हानि हुई. लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी और नौकरी के बीच जो लस्तगा लगाया था वह बहुत हद तक अभी भी बदस्तूर चालू है. वस्तुत: हमें सभी भारतीय भाषाओं को सक्षम बनाने के लिए काम करना होगा न कि किसी एक चुनी हुई भाषा को जैसा अभी तक की रुझान के तहत अंग्रेजी को लेकर होता रहा है. इसके लिए सरकार के स्तर पर संचार के लिए भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन की ठोस नीति बनानी चाहिए.

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केंद्र में सभी संचार अनिवार्य रूप से द्विभाषी होने चाहिए. अर्थात हिन्दी के साथ क्षेत्रविशेष की भाषा (न कि अंग्रेजी) में भी पत्र-व्यवहार होना चाहिए. इसी तरह राज्यों को भी अपनी भाषा और हिन्दी में केंद्र से पत्र-व्यवहार करना चाहिए. देश के विभिन्न राज्यों के बीच भी आपसी संचार द्विभाषी होना चाहिए. यह जरूरी है कि पत्र का उत्तर अनिवार्य रूप से उस भाषा में ही भेजा जाय जिस भाषा में मूल पत्र आया रहा हो. इसके लिए बुनियादी ढांचा, कर्मचारी और अधिकारियों के प्रशिक्षण की जरूरत होगी. इसके लिए हर राज्य और केंद्र में 22 भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी का अनुवाद ब्यूरो की स्थापना केंद्र और राज्य के सचिवालयों में होनी चाहिए.

सार्वजनिक क्षेत्र में सभी वस्तुएं और उत्पाद चाहे वे भारत में या विदेश में में बने या उत्पादित हैं यदि भारत के बाजार में उतरते हैं तो उनसे जुड़ी जानकारी राज्य की भाषा, और हिन्दी और जरूरी हो तो अंग्रेजी के क्रम में दी जानी चाहिए. उस उपकरण को चलाने की की विधि वाली विवरणिका भी ऐसे ही रहनी चाहिए. इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के बारे में भी यह बात लागू होगी. शिक्षा के क्षेत्र में माध्यम और विषय का प्रश्न आपस में जुड़ा हुआ है. मातृभाषा / क्षेत्रीय भाषा में प्रारम्भिक शिक्षा की उपयुक्तता को सभी स्वीकारते हैं. परन्तु दूसरे राज्यों से आने वाले बच्चों की असुविधा पर भी ध्यान देना होगा. मातृभाषा के अतिरिक्त कौन सी भाषा पढाई जाय ये राज्य तय करें. परन्तु कितनी भाषाएँ विषय के रूप में पढाई जाय यह भी खुले मन से तय करना पडेगा. उच्च माध्यमिक स्तर पर भाषा के प्राप्तांक व्यावसायिक परीक्षाओं की पात्रता में शामिल किये जाने चाहिए और उन्हें अन्य विषयों के साथ बराबरी का महत्त्व भी दिया जाना चाहिए.

उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में दी जानी चाहिए. अध्यापन की कठिनाइयों को देखते हुए द्विभाषी प्रणाली महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में व्यवस्थित रूप से तत्काल शुरू की जानी चाहिए. प्रत्येक पाठ्यक्रम में उपयोग हेतु आधारभूत स्तरीय पाठ्यपुस्तकें पहचान कर तैयार की जानी चाहिए. उन्हें आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं में अनूदित कर उपलब्ध कराया जाय. समय के साथ इन भाषाओं में मौलिक पाठ्य पुस्तक भी तैयार होने लगेगी. कुछ प्रयास हुए हैं परन्तु वे अंग्रेजी में हैं और अन्य भाषाओं कुछ कुछ हैं पर उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं है. अच्छी गुणवता वाली पुस्तकें सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए. ज्ञान के प्रसार के लिए संस्थाओं को अपने स्तर पर कार्य करना होगा. स्थानीय स्तर पर द्वि या बहु भाषी समाधान खोजने की दिशा में कारगर उपाय आवश्यक है.

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भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण के लिए संस्कृत का तीन वर्ष का पाठ्यक्रम छठीं या आठवीं कक्षा से अवश्य लागू किया जाना चाहिए. वस्तु : प्राचीन भारतीय भाषाओं से विज्ञान, समाज विज्ञान और कलाओं के विषय ज्ञान स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए. परम्परागत ज्ञान, आतंरिक चेतना और आत्म-बोध का हिस्सा बनाना चाहिए न कि सूचना मात्र . उच्च सैद्धान्तिक ज्ञान शिक्षा , भाषा , व्याकरण, समाज , राजनीति , शिल्प , साहित्य, दर्शन, गणित, संगीत, नृत्य तथा नाटक आदि के क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. इनका पश्चिमी ज्ञान के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी होना चाहिए.

जन-जातीय भाषाओं के लिए व्यवस्थित नीति या योजना अभी तक न थी. इधर कुछ राज्यों ने इस ओर कुछ ध्यान दिया है. उनकी लिपि और वाचिक संस्कृति की सामग्री की रिकार्डिंग की व्यवस्था के लिए केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाना होगा. वर्णनात्मक व्याकरण और पाठ्यचर्या के लिए भी व्याकरण तैयार होने चाहिए. राष्ट्रीय अनुवाद मिशन तथा नेशनल टेस्टिंग सर्विस आठवीं अनुसूची की भाषाओं पर कुछ कार्य कर रहे हैं परन्तु जन-जातीय भाषाओं को भी शामिल करना होगा. केन्द्रीय भाषा संस्थान से अपेक्षा है कि लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन का काम और अच्छी तरह आयोजित करे. मातृभाषा के शिक्षकों की नियुक्ति की योजना भी केंद्र सरकार की है जो राज्य सरकारों के साथ परामर्श से चलानी हैं. इनके शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था विभिन्न संस्थानों में की गई थी और राज्य शिक्षा अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् और जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान (डाएट ) जैसी संस्थाएं कुछ भाषाओं में ही काम कर रहे हैं.

लुप्तप्राय भाषाओं के लिए कुछ कार्यक्रम हैं पर जन-जातीय भाषाओं के तर्ज पर इनके लिए भी कार्य होना चाहिए. कोई भाषा तब समाप्त हो जाती है जब उसे बोलने वाले नहीं रहते. अंडमान और निकोबार द्वीपों में यह स्थिति है. वहां की कुछ जनजातीय भाषाएँ, अरुणाचल, पश्चिमी बंगाल, हिमाचल, उत्तराखंड आदि में कई भाषाएँ हैं जिनको बोलने वाले दस हजार से कम लोग हैं. केन्द्रीय भाषा संस्थान और विश्वविद्यालयों के भाषाविज्ञान विभागों को इन भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और संबर्धन का कार्य करना चाहिए. इनकी शब्दकोष, व्याकरण, लिपि, सामग्री का दस्तावेजीकरण, इ-कंटेंट निर्माण, अनुवाद, वाचिक साहित्य को संरक्षित करना महत्वपूर्ण होगा. इन भाषाओं के शिक्षण के साथ ही इनके प्रमुख साहित्यिक कार्यों को अन्य आधुनिक भाषाओं में अनुवादित करना होगा.

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जब सभी भारतीय भाषाओं में शिक्षा होगी तो भाषिक और सांस्कृतिक विविधता समृद्ध होगी और उनके साथ ही सांस्कृतिक एकता भी, क्योंकि भारतीय भाषाएँ भारतीय ज्ञान और संस्कृति को संजो कर रखती हैं. इन सब के कोश का कार्य वे करती हैं. यह लोकप्रचलित कलाओं में पूरे भारत में विशेष रूप से अभिव्यक्त दिखती हैं. भाषा को सुदृढ़ बनाने और देश की सांस्कृतिक–बौदधिक एकता को मजबूत करने में कोई अंतर नहीं है. परन्तु यह जरूरी होगा कि सभी भारतीय भाषाओं में उपस्थित भारतीय सभ्यता और संस्कृति के योजक तत्व शिक्षा में उभर कर सामने आयें.

विषय के रूप में भाषाओं की शिक्षा ऎसी पाठ्य चर्या पर टिकी होने चाहिए जिसमें भारत के विभिन्न भागों से मूल ग्रन्थ के अंश के अनुवाद पाठ्यक्रम जरूर शामिल हों. इस तरह हिन्दी पढ़ाने की पुस्तक में उर्दू या तमिल या मणिपुरी की कथा शामिल हो, तब हम भारत की सांस्कृतिक विविधता का भारत की प्राकृतिक भाषिक विविधता के माध्यम से प्रोत्साहित करेंगे. भारत की विभिन्न भाषाओं की साहित्यिक , सांस्कृतिक , सौन्दर्यात्मक और ज्ञान-परम्परा से पाठ्य सामग्री ली जानी चाहिए और इस बात को पाठ्य पुस्तक बनाने वाली राष्ट्रीय संस्थाएं कडाई से सुनिश्चित करें.

उल्लेखनीय है कि बिना दुराग्रह के सभी मातृभाषाओं को राष्ट्रीय, अंतर क्षेत्रीय और अंतर राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में विकसित किया जाना चाहिए. जब हम भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने की बात करते हैं तो हमारा आशय है उनका संरक्षण, प्रोत्साहन और विकास. क्षेत्र की मातृभाषा को शिक्षा का वैकक्ल्पिक माध्यम बुनियादी सुविधा के अनुसार उपलब्ध किया जा सकता है. जहां ऐसा नहीं है वहां शीघ्र उपलब्ध करानी चाहिए. यह न केवल सांस्कृतिक एकता को मजबूत करेगी बल्कि भारतीय भाषाओं में आपस में अनुवाद को महत्वपूर्ण बनाएगा. भाषिक विविधता से सांस्कृतिक एकता की ओर आगे बढ़ सकेंगे.

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