Dr jitendra singh Bio Butamene Technology

Bio Butamene Technology: बायो-ब्यूटामेन तकनीक से ₹40,000 करोड़ की बचत संभव – डॉ. जितेंद्र सिंह

  • Bio Butamene Technology: ‘अपशिष्ट जैसी कोई चीज नहीं होती’; अपशिष्ट से धन: भारत के विकास का इंजन बनकर उभर रहा है: डॉ. जितेंद्र सिंह
  • यह बिटुमेन में आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम है; आयात पर निर्भरता कम करना, आर्थिक लचीलापन बढ़ाना मुख्य लक्ष्य है : डॉ. जितेंद्र सिंह
  • भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को गति प्रदान करने में सार्वजनिक-निजी सहयोग को मजबूत करना: डॉ. जितेंद्र सिंह

नई दिल्ली, 30 मार्च: Bio Butamene Technology: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि फसल अपशिष्ट को बायो-बिटुमेन में परिवर्तित करने से भारत को प्रतिवर्ष लगभग 40,000 करोड़ रुपये के आयात की बचत हो सकती है।

उन्होंने कहा कि यह नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) और देहरादून स्थित सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) द्वारा विकसित स्वदेशी बायो-बिटुमेन प्रौद्योगिकी के उपयोग से संभव हुआ है।

डॉ. सिंह ने कहा कि पारंपरिक (Bio Butamene Technology) बिटुमेन के स्थान पर बायो-बिटुमेन का आंशिक उपयोग भी आयात पर निर्भरता को काफी हद तक कम करेगा, आर्थिक लचीलेपन को मजबूत करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि बुनियादी ढांचे का विकास वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों से अप्रभावित रहे।

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वह स्वदेशी रूप से विकसित “लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास से बायो-बिटुमेन” (Bio Butamene Technology) तकनीक को बड़े पैमाने पर उद्योग में अपनाने के उद्देश्य से वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा आयोजित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, सीएसआईआर की महानिदेशक और डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी, वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, उद्योग प्रतिनिधि और हितधारक भी उपस्थित थे।

डॉ. सिंह ने इस पहल को एक क्रांतिकारी कदम बताया जो एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती को राष्ट्रीय आर्थिक अवसर में बदलने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग छह करोड़ टन फसल अवशेष उत्पन्न होते हैं, जिनमें से अधिकांश को जला दिया जाता है, जिससे गंभीर वायु प्रदूषण होता है। वहीं दूसरी ओर, भारत प्रतिवर्ष लगभग 88 लाख टन बिटुमेन की खपत करता है, जिसका लगभग 50-58 प्रतिशत आयात किया जाता है और इस पर 25,000-30,000 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि यह तकनीक कृषि अपशिष्ट को सड़क निर्माण के लिए एक मूल्यवान संसाधन में परिवर्तित करके इन दोनों चुनौतियों का एक साथ समाधान करती है।

डॉ. सिंह ने इसे “अपशिष्ट से धन” का एक बेहतर उदाहरण बताते हुए, कहा कि आधुनिक, नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्था में अपशिष्ट की अवधारणा तेजी से अप्रासंगिक होती जा रही है। उन्होंने कहा, “अपशिष्ट जैसी कोई चीज नहीं होती, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से उपयोग किए जाने पर प्रत्येक संसाधन का मूल्य होता है।” उन्होंने आगे कहा कि धान की भूसी जैसे कृषि अवशेष अब किसानों के लिए प्रदूषण का कारण बनने के बजाय आय का स्रोत बन सकते हैं।

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केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिन्होंने 2014 में ही आत्मनिर्भरता और आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के दौरान भारत की तैयारियों, जिनमें स्वदेशी वैक्सीन विकास और निर्बाध प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली शामिल हैं, ने यह साबित कर दिया कि संकट के समय शुरुआती नीतिगत दिशा-निर्देश राष्ट्रीय शक्ति में कैसे तब्दील होते हैं। उन्होंने कहा कि इसी तरह की दूरदर्शिता अब भारत को सतत, कम कार्बन उत्सर्जन वाले बुनियादी ढांचे की ओर ले जा रही है।

Bio Butamene Technology: डॉ. सिंह ने इस तकनीक के बहुआयामी प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक साथ कई राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को पूरा करती है, जैसे पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करना, आयात बिलों को घटाना, किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान करना, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना और भारत की नेट ज़ीरो प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाना। उन्होंने यह भी बताया कि इस पहल की सफलता मंत्रालयों, संस्थानों और उद्योग के बीच मजबूत समन्वय को दर्शाती है, जो सिर्फ सरकार की पहल (अलगाव) को तोड़ने और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है।

उन्होंने समानांतर नवाचारों का जिक्र करते हुए खाना पकाने के बाद बचे हुए तेल को जैव ईंधन में परिवर्तित करने और सड़क निर्माण में स्टील स्लैग जैसे औद्योगिक कचरे के उपयोग जैसे उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से एक नया आर्थिक तंत्र बन रहा है जहां अपशिष्ट पदार्थों का मौद्रिक उपयोग हो रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों को फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनकी आपूर्ति करने के लिए प्रोत्साहित करना वायु प्रदूषण से निपटने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

डॉ. सिंह ने संपर्क के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि वैज्ञानिक नवाचारों को हितधारकों तक आसानी से समझ में आने वाले प्रारूपों में, विशेष रूप से डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से, संप्रेषित किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि “वन वीक वन लैब” जैसी पहलों ने वैज्ञानिक संस्थानों को उद्योग, किसानों और आम जनता से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस पहल को कृषि, विज्ञान और उद्योग का ऐतिहासिक संगम बताया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक पराली जलाने की समस्या का व्यावहारिक और व्यापक समाधान प्रदान करती है और किसानों की आय बढ़ाती है तथा पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करती है। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, बुनियादी ढांचे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता आवश्यक है, और बायो-बिटुमेन जैसी नवोन्मेषी तकनीकें इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

सीएसआईआर की महानिदेशक और डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी ने प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाए जाने का आग्रह करते हुए कहा कि अल्प समय में ही कई उद्योगों ने इसे अपना लिया है और उत्पादन एवं जमीनी स्तर पर इसका कार्यान्वयन जारी है। उन्होंने कहा कि यह प्रौद्योगिकी पेट्रोलियम आधारित बंधन से टिकाऊ जैव-आधारित विकल्पों की ओर एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतीक है। उन्होंने आगे बताया कि इसी कृषि जैव द्रव्यमान का उपयोग कीट प्रबंधन, उन्नत कार्बन सामग्री और ऊर्जा भंडारण जैसे अनुप्रयोगों के लिए भी किया जा सकता है, जो इसकी व्यापक औद्योगिक क्षमता को दर्शाता है।

बायो-बिटुमेन तकनीक में चावल के भूसे, गेहूं के भूसे और अन्य फसल अवशेषों जैसे कृषि जैवमास का उपयोग थर्मोकेमिकल (पायरोलिसिस) प्रक्रिया के माध्यम से नवीकरणीय बाइंडर बनाने के लिए किया जाता है। यह पारंपरिक बिटुमेन के 30 प्रतिशत तक की जगह ले सकता है, प्रदर्शन में कोई कमी किए बिना, और इसने बेहतर स्थायित्व के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी दर्शायी  है। इस तकनीक के सफल परीक्षण अनुप्रयोग पहले ही हो चुके हैं, जिनमें सड़क निर्माण भी शामिल है, और अब यह बड़े पैमाने पर उपयोग की ओर बढ़ रही है।

सीएसआईआर के अधिकारियों ने कहा कि संगठन मानकीकरण, क्षेत्रीय सत्यापन और क्षमता निर्माण के लिए उद्योग भागीदारों, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगा ताकि इसे राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाया जा सके।

भारत को सतत अवसंरचना नवाचार में अग्रणी स्थान पर रखते हुए, इस पहल से सड़क निर्माण विधियों में बदलाव आने की उम्मीद है, जिससे वे अधिक पर्यावरण-अनुकूल, लागत प्रभावी और भविष्य के लिए तैयार होंगी, इसके साथ ही आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान देंगी।