NEET Exam: शिक्षा और परीक्षा : साख बहाल करने का सवाल: गिरीश्वर मिश्र
NEET Exam: मेडिकल प्रवेश परीक्षा यानी ‘नीट’ में पेपर लीक की ताजी घटना ने एक बार फिर पूरे देश को खास तौर पर युवा और किशोर वर्ग को झकझोर दिया है। देश भर के लाखों परीक्षार्थियों के वर्षों के परिश्रम और उनकी ख़ुद की और परिवार वालों की आशाओं और आकांक्षाओं सब पर पानी फिर गया। बड़े परिश्रम और अच्छे खासे पैसे लगा कर कोचिंग आदि से तैयारी कर परीक्षा की दहलीज पर पहुंचने के बाद कुछ थोड़े से धनलोलुप आपराधिक तत्वों की करतूत ने युवा वर्ग को बड़ा निराश किया। वे अब कुंठा और अनिश्चय के दौर में पहुँच रहे हैं । पर यह घटना किसी भी तरह आकस्मिक तो नहीं ही कही जा सकती क्योंकि पिछली परीक्षा में हुई नीट पेपर लीक की सीबीआई जांच अभी ख़त्म नहीं हुई है।

वह कब पूरी होगी और उसका क्या हस्र होगा किसी को नहीं मालूम । अर्थात् यह तो नहीं कहा जा सकता कि सरकारी तंत्र को इस तरह की संभावना का कोई अंदेशा न रहा होगा । तब भी परीक्षा की एजेंसी सजग नहीं हुई और जरूरी एहतियात बरतने में कोताही हुई और उसका परिणाम सामने है। यह समाज के प्रति ग़ैर ज़िम्मेदारी भरा एक अक्षम्य अपराध है। अनंत कालीन जाँच बैठा कर चीज़ों को मुल्तबी न रख इस घटना की जिम्मेदारी तय कर अविलंब उचित कारवाई की जानी चाहिए।
गौर तलब है कि प्रवेश-परीक्षा की पहले से चली आ रही पुरानी व्यवस्था को सुधारने के लिए एनडीए की सरकार द्वारा वर्ष 2017 में राष्ट्रीय स्तर की एक स्वायत्त व्यवस्था ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ (NTA) को स्थापित करने का निर्णय लिया गया । परीक्षाओं के प्रकार और परीक्षार्थियों की निरंतर बढ़ती संख्या के चलते यह सुधार बहुत जरूरी था। एनटीए का उद्देश्य रखा गया था कि उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली एक मानक व्यवस्था को भारत में प्रतिष्ठित किया जाय ।
युवा प्रधान देश में परीक्षा की विकराल होती जा रही चुनौती के लिए इस पहल को राम बाण जैसा समझा गया। विकसित भारत के लिए योग्य मानव संसाधन तैयार करने में इस एजेंसी की बड़ी भूमिका है। यह सोच कर एनटीए के संचालन के लिए एक आईएएस स्तर का डीजी, अध्यक्ष, डाइरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर आदि के साथ एक उच्चस्तरीय प्रबंधकीय अमला तैयार हुआ। सारी व्यवस्था की देख रेख के लिए एनटीए की अपनी प्रबंध समिति का भी प्रावधान किया गया जिसे पूरी तरह से अधिकारसंपन्न बनाया गया ।
सरकार और आम जनता सबको यह आशा थी कि प्रोफेशनल दृष्टि से काम करने वाली एनटीए परीक्षा की व्यवस्था में जमीनी परिवर्तन ला सकेगी। यानी अखिल भारतीय स्वरूप वाली यह संस्था प्रवेश परीक्षाओं का काम राष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष, विश्वसनीय, त्वरित या समय पर और स्तरीय ढंग से संपादित करेगी। परीक्षा की व्यवस्था में गुणात्मक सुधार लाने के लिए कटिबद्ध सरकार को इस संस्था से बड़ी आशाएँ थीं। अब जिस तरह से परीक्षा के संचालन में लगातार चूक हो रही है उससे कई सवाल पैदा हो रहे हैं। परीक्षा की शुचिता और मानकों को बनाए रखने की जिम्मेदारी से एनटीए किड्सी भी तरह नहीं मुकर सकता। पेपर लीक की बार-बार की घटनाओं के चलते एनटीए का यह प्रयोग और उसकी कार्य प्रणाली अब संदेह के घेरे में आ रहे हैं। शायद एनटीए को पूरी तैयारी के साथ अमल में लाने का कम भी अभी पूरा नहीं हुआ है।
स्मरणीय है कि एनटीए (NTA) की व्यवस्था के पहले प्रवेश परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण था और उच्च शिक्षा की संस्थाएं अपने स्तर पर परीक्षा कराती थीं और उनकी अपनी जिम्मेदारी बनती थी । वे परीक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में रुचि भी लेती थीं क्योंकि उसके साथ उन संस्थाओं की निजी साख भी जुड़ी रहती थी । शिक्षा और परीक्षा का निकट संबंध रहता था। अब ये संस्थाएं उदासीन रहती हैं और बाहर से लादी जाने वाली आरोपित व्यवस्था से उनका बहुत कम लगाव रहता है । दूसरी ओर धीरे-धीरे सभी प्रवेश परीक्षाओं को एनटीए को सुपुर्द करते जाने की प्रथा भी चल पड़ी है । ऐसी हालत में उनके काम का दायरा भी अब बहुत विस्तृत हो चुका है जो संभवतः उनकी अपनी क्षमता से बाहर जा रहा है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि आज के माहौल में प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में किसी न किसी तरह सेंध लगा कर परीक्षा-परिणाम को प्रभावित कर जैसे-तैसे जबरदस्ती अपने पक्ष में करने कराने के मामले अब लोगों को चौकाते नहीं हैं । चूँकि सीटें कम होती हैं और अभ्यर्थी बहुत ज्यादा हैं, इसलिए प्रवेश के लिए मारामारी मचती रहती है। परीक्षा के पेपर लीक की घटनाएँ कई तरह की परीक्षाओं में पिछले दशकों में पहले भी सामने आ चुकी हैं । यदि इस घटना को अपराध के रूप में देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इनसे जुड़े अपराधियों पर उन मामलों में क़ानूनी झमेले कुछ ऐसे चलते हैं कि समय पर कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं हो पाती है। इस तरह के ज्यादातर मामलों में सबूत के अभाव में अपराधियों को दंडित करना लगभग असंभव होता रहा है ।
वाइरस सरीखी तेजी से फैलती इन घटनाओं के तार भी जगह-जगह से जुड़े होते हैं। आसानी से धन कमाना ही इसके मूल में होता है और उसके अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष लाभार्थी अनेक होते हैं । इस तरह की घटना यह तथ्य भी सामने लाती है कि मुख्य धारा की औपचारिक शिक्षा तेजी से अपनी साख खोती जा रही है। शिक्षा के व्यापारीकरण का कई रूप ले रहा है । इसके ही अंग के रूप में कोचिंग का महामारी जैसा फैलता विशाल धंधा भी बदस्तूर जारी है जिसकी आज एक बड़ी भारी अर्थ व्यवस्था बन चुकी है । अनुमान है कि जेईई, नेट, तथा नीट आदि विभिन्न परीक्षाओं की कोचिंग के बाज़ार की क़ीमत इस समय यह अट्ठावन करोड़ रुपयों की है। यह नफे का व्यापार एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था का रूप ले चुका है।
अनुमान यह भी है कि लगभग 95 प्रतिशत स्कूली बच्चे इसमें शामिल हो कर परीक्षाओं की तैयारी में लगे हुए हैं। संस्थाओं में नियमित औपचारिक शिक्षा की जगह कोचिंग द्वारा शिक्षा की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है । कोटा, दिल्ली, पुणे और पटना जैसे शहर आज कोचिंग के प्रमुख केंद्र बन रहे हैं। अब स्कूली बच्चों के माता-पिता अपने पालकों के लिए कोचिंग को एक अनिवार्य इन्वेस्टमेंट मानने लगे हैं। शिक्षा का यह यथार्थ विद्यालयों में चल रही औपचारिक शिक्षा के खोखलेपन की पुष्टि करता है।
इन सबका सम्मिलित परिणाम यह है कि पेपर लीक करने और नक़ल कराने जैसी घटनाएँ कम होने का नाम नहीं ले रही हैं । इस तरह की चेष्टा पर लगाम लगाकर कम करने के उपायों का कोई असरदार फल नहीं दिखता । सच्चाई यही है कि ऐसी वारदातें देश के कई कोनों में होती रही हैं । इसमें विभिन्न प्रकार की परीक्षाएं शामिल होती रहीं हैं और उनका दायरा लगातार बढ़ता गया है । दुस्साहस, बेईमानी, और तिकड़म की सहायता से लोग अपनी सफलता को सुनिश्चित करने का नायाब नुस्खा तैयार करने में लगे रहते हैं ।
पढ़ाई से अधिक परीक्षा में अच्छे नंबर लाने के लिए शॉर्टकट के तरीकों को पहचानने में अब लोग अधिक मन लगाते हैं । वैसे भी सामाजिक परिवेश में परिश्रम और योग्यता का होना न होना अब ज़्यादा महत्व नहीं रखता । अब लोग मानने लगे हैं कि योग्यता, चरित्र और कार्यकुशलता जैसे सद्गुण परीक्षाओं में सफलता और नौकरी पा कर नियुक्ति हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं होते। उसके लिए योग्यता के कुछ अतिरिक्त उद्योग करना पड़ता ।
शैक्षिक परिसर की साख घट रही है। इंटर, बीए/बीएससी और एमए/एमएससी की औपचारिक पढ़ाई और उसकी डिग्री पर अब किसी का भरोसा नहीं रहा । अगली कक्षा में स्वाभाविक प्रवेश संभव नहीं होता है। उसके लिए भी परीक्षा देनी होती है । इंटर के बाद स्नातक परीक्षा में प्रवेश के लिए एनटीए की राष्ट्रीय परीक्षा के नंबर निर्णायक होते हैं । पढ़ाई और ज्ञान की जगह परीक्षा में पाए जाने वाले अंक ही काम आते हैं। लगातार बढ़ती बेरोजगारी के वर्तमान दौर में अवसरों की कमी के चलते प्रतिस्पर्धी छात्रों पर सफलता पाने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है ।
परीक्षाओं में सफलता पाना कठिन हो रहा है और हमारी शिक्षा परीक्षणमुखी होती जा रही है, इतनी कि ज्ञानार्जन हाशिये पर जा रहा है । सुभीते के लिए बहु-उत्तरीय प्रश्न (एमसीक्यू) के सहारे यांत्रिक परीक्षा का बोलबाला हो रहा है । इसका दुखद पक्ष यह भी है कि यह पद्धति सोच-विचार की जगह रटंत शिक्षा को और मजबूत कर रही है । इसके चलते उत्सुकता और खोजबीन की जगह दुहराव और गैर-सृजनात्मक रुचि जो प्रश्रय मिल रहा है । शिक्षा और परीक्षा दोनों की साख जोखिम में है। नई शिक्षा नीति की आंख इस पर है पर जरूरी परिवर्तन दूर की कौड़ी लगती है। युवा वर्ग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए जरूरी सुधार हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

