Rahi Masoom Raza: BHU में राही मासूम रज़ा जन्म शताब्दी समारोह संपन्न
Rahi Masoom Raza: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रख्यात साहित्यकार डॉ. राही मासूम रज़ा की जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित समारोह का समापन हुआ।
- भारत बोध के राही’ कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ विमर्श
- राही मासूम रज़ा (Rahi Masoom Raza) की रचनाएँ भारतीय संस्कृति की साझी विरासत और सामाजिक यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति : डॉ लक्ष्मण आचार्य
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📲 WhatsApp पर शेयर करेंरिपोर्ट: डॉ राम शंकर सिंह
वाराणसी, 26 अक्टूबर: Rahi Masoom Raza: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पंडित ओंकार नाथ ठाकुर प्रेक्षागृह, संगीत एवं मंच कला संकाय में माटी ट्रस्ट की पहल पर आयोजित प्रख्यात साहित्यकार डॉ. राही मासूम रज़ा के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित ‘भारत-बोध के राही’ का समापन समारोह सम्पन्न हुआ. समारोह में साहित्य, भारतीय संस्कृति, साझी विरासत और सामाजिक यथार्थ के विभिन्न पक्षों पर विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता के रूप में असम के राज्यपाल डॉ लक्ष्मण आचार्य, कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, भारतीय शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन एन. पी. सिंह मुख्य वक्ता, तथा इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक के. जी. सुरेश उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन माटी फाउंडेशन, भारत वैभव तथा संगीत एवं मंच कला संकाय के द्वारा किया गया।
अवसर पर मुख्य अतिथि व असम के राज्यपाल लक्ष्मण आचार्य ने कहा कि, भारत रत्न भूपेन हजारिका और राही मासूम रज़ा (Rahi Masoom Raza) का जन्म शताब्दी वर्ष भारतीय सांस्कृतिक चेतना और विविधता को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है। यह आयोजन महामना मदन मोहन मालवीय के भारत बोध के प्रति भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि है.
आपने कहा कि राही मासूम रज़ा (Rahi Masoom Raza) की रचनाओं में माटी की खुशबू, सामाजिक यथार्थ और लोकजीवन के सरोकार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। डॉ आचार्य ने सभ्यतागत निरंतरता, लोकमंगल की भावना और प्राचीन सभ्यता की आत्मा के पुनर्जागरण पर बल दिया। उन्होंने ‘विकास भी, विरासत भी’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्यकार अपने समय के समाज के यथार्थ और उसकी चुनौतियों को मुखर स्वर प्रदान करते हैं.
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने राही मासूम रज़ा (Rahi Masoom Raza) के कृतित्व और उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त सामाजिक बोध की चर्चा करते हुए साहित्य को समाज की संवेदना और चेतना से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत आवश्यक है कि कुछ लोग आगे आएँ और राही मासूम रज़ा जैसे साहित्यकारों तथा महापुरुषों के योगदान को निरंतर याद करते रहें।
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विशिष्ट अतिथि के. जी. सुरेश ने कहा कि “राही मासूम रज़ा ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने भारत बोध को आत्मसात किया था। महाभारत के माध्यम से उन्होंने भारतीय विरासत और संस्कृति को व्यापक पहचान दिलाई। उन्होंने कहा कि ‘आधा गाँव’ साझी विरासत के खोने की पीड़ा और सामाजिक यथार्थ का सशक्त चित्रण है।
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मुख्य वक्ता भारतीय शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन एन. पी. सिंह ने कहा कि “सृजनधर्मियों की कभी मृत्यु नहीं होती, उनकी रचनाएँ उन्हें अमर बनाती हैं। उन्होंने कहा कि राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ में अभिव्यक्त सत्य आज 21वीं सदी में और भी प्रामाणिक प्रतीत होता है। राही की रचनात्मकता को महाभारत धारावाहिक के आरंभ में ‘मैं समय हूँ’ के संवादों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। उनकी रचनाएँ वर्तमान के गर्भ से भविष्य की कल्पना करती हैं और समाज को आने वाली चुनौतियों के प्रति सचेत करती हैं।”
संचालन भारत वैभव के संयोजक डॉ. धीरेन्द्र राय ने किया. आपने गंगा, गंगौली और गाजीपुर के सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि, गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि पूर्वांचल की स्मृतियों, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना की प्रवाहमान धारा है। राही की रचनाओं में गंगा की तरह ही विविधता, आत्मीयता और साझी विरासत का प्रवाह दिखाई देता है. अवसर पर संगीत एवं मंच कला संकाय प्रमुख प्रो. संगीता पंडित, प्रो. वशिष्ठ अनूप, डॉ. विनोद जायसवाल, डॉ. कासिम सहित बड़ी संख्या में छात्र व शोधार्थी उपस्थित रहे.

