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Education: जंतर-मंतर से शिक्षा: गिरीश्वर मिश्र

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उनकी माँग है कि वर्तमान शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें । तर्क है कि उनकी  मुखियागिरी में हुई नीट की परीक्षा में पेपर लीक हुआ और लाखों युवा परीक्षार्थियों और उनके परिजनों को तरह-तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा इसलिए जिम्मेदारी लेते हुए उनको इस्तीफ़ा देना चाहिए या सरकार को उनसे इस्तीफ़ा के लेना चाहिए । अभी-अभी जन्मी काक्रोच जनता पार्टी (सीजेपी) और सोनम वांगचुक, जो लद्दाख के समाजकर्मी हैं और अध्यापक की पृष्ठभूमि वाले हैं, आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। वांगचुक ने 26 दिनों से चल रहे अनशन को तोड़ दिया है। साठ साल के हो रहे वांगचुक अपने अस्पताल से दिए गए वीडियो-संदेश में सबसे शांति और अहिंसा के साथ लड़ाई की बात करते हैं।

विपक्षी राजनीति इस अवसर पर अपना विपक्षी धर्म निभाने में जुट गई है। वह संसद के मानसून सत्र को चलने नहीं देने के लिए आमादा है। साथ ही सड़क पर और प्रधानमंत्री आवास पर मार्च और धरना-प्रदर्शन में जुटा रहा है। देशव्यापी मार्च की योजना है। ये नेता शिक्षा में सुधार ले आने की बात भी कहते हैं पर मंत्री के इस्तीफे से ज़्यादा सुधार की कोई बात अभी तक सामने नहीं आई है । इन नेताओं की शिक्षा से कभी ख़ास लेना-देना नहीं रहा है, इसलिए वे राजनीतिक अवसर के रूप में ले रहे हैं। इसके बावजूद भी यदि वे शिक्षा का नाम ले रहे हैं तो यह शिक्षा-प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण है। यह बेहद जरूरी है कि शिक्षा-व्यवस्था पर समग्रता में विचार किया जाय। जंतर-मंतर शिक्षा जैसे गहन और गंभीर विषय पर बहुत सहायक न होगा। इस पर गंभीर चर्चा की ज़रूरत है और गलतियों को सुधार कर नई राह ढूँढने की आवश्यकता है।

 पेपर लीक होना कोई नई बात नहीं है। यह अपराध है जिसमें लिप्त लोगों को दंडित किया जाना चाहिए।  अब तक उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश में पिछले दस बारह सालों में कुल मिला कर लगभग डेढ़ सौ बार परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनायें जाहिरी तौर पर दर्ज हो चुकी हैं। सरकार ने इस बार के मामले में गिरफ़्तारी की है और इससे जुड़े लोगों को जेल भेजकर कार्रवाई की जा रही है। सरकार सख्ती से निपटने के लिए कानून भी बना रही है। फ़ास्ट ट्रैक अदालत गठित कर मामलों पर त्वरित कार्रवाई की तैयारी हो रही है।

यह अलग बात है कि  ऐसे मामलों में कभी किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। गंगा पर पुल गिर जाता है और यह तय नहीं हो पाता कि कौन जिम्मेदार है। गंगा जी ही शायद निगल गईं। उन्हें ही कुछ संदेश देना हो। यानी पेपर लीक बहुत सी परीक्षाओं में जगह-जगह पर होता आ रहा है और लोगों को इसकी आदत सी पड़ गई है। लेकिन साल्वर गैंग सक्रिय है और बोर्ड परीक्षा में नकल जिस पैमाने पर होती है वह क़ानून व्यवस्था का प्रश्न बन जाता है और कभी कभी धारा 144 लगाने की नौबत आ जाती है।

 यह भी गौर करने की बात है कि इस साल हुई नीट की पहली परीक्षा जिसमें लीक हुआ था बीस लाख से अधिक छात्र बैठे थे। पेपर लीक होने से इन्हें बड़ी मुसीबत झेलनी पड़ी थी। सरकार ने चाक-चौबंद होकर दुबारा परीक्षा कराई जिसमें उन्नीस लाख से ज्यादे छात्र शामिल हुए और लीक जैसी दुर्घटना नहीं हुई । अब नीट की पुनर्परीक्षा का परिणाम आ चुका है जिसमें ग्यारह लाख से कुछ ज़्यादे की संख्या में छात्र प्रवेश-योग्य पाये गए हैं।

इनमें 58 प्रतिशत से अधिक छात्रायें हैं। वर्तमान में देश भर के 823 मेडिकल कालेजों में एमबीबीएस में प्रवेश पाने के लिए कुल 1,36,939 सीटें ही उपलब्ध हैं। इसका आशय है प्रवेशार्थियों का मनोबल ऊंचा था और उन्होंने इस मुश्किल का डटकर मुकाबला किया। पर यह घटनाक्रम एक विकट संकट की ओर भी संकेत करता है। ये आंकड़े हमारी शिक्षा-प्रणाली की कमज़ोरियों और समाज की मानसिकता को लेकर बहुत कुछ कह रहे हैं। नीट में प्रवेश की मंशा पर भी सोचना होगा और जीविका के लिए उपलब्ध अवसरों पर भी गौर करना होगा।

कम सीटों के नाते विशाल देश में प्रवेश के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में सफलता को सुनिश्चित करने के लिए शॉर्टकट अपनाने को हर कोई मचल रहा है। नीट डाक्टरी के लिए प्रवेश द्वार और धनार्जन का प्रबल उपाय। चाहे जैसे हो और पात्रता भी हो न हो अपनी सीट सुरक्षित करवाने की धुन छात्रों और उनके माता-पिता को कुछ भी धन और धर्म दोनों की क़ुरबानी देने के लिए लो उद्यत रहते हैं। लीक हुआ पेपर लाखों में बिका और इस व्यवसाय की कमाई बेइंतहा है। पेपर लीक की जो कथा उभर रही है वह बेईमानी की कई-कई परतों को खोल रही है।

वह समाज में मूल्यों के क्षरण को व्यक्त करती है। यह तमाम तरह के शॉर्टकट से जुड़ी हुई है जो समाज को दीमक की तरह खा रहे हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता जिस तरह से गिर रही है। ऐसे में सफलता के लिए आतुर समाज में इस तरह की नैतिक दुर्घटनाएं स्वाभाविक हैं। आज  सभी दल शिक्षा पर बात कर रहे हैं, पर गंभीरता किसी के दिल दिमाग में है, यह संदेहास्पद है। मंत्री का इस्तीफा देना या लेना प्रतीकात्मक असर वाला होगा, पर शिक्षा सुधार की कुंजी तो  नहीं ही है। व्यापक राजनीतिक फ़सल काटने की ताक में सभी जरूर हैं।

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शिक्षा के सवाल क्या हैं और उनको समझने की कोशिश करने की बात कोई नहीं कर रहा । अगर मंत्री जी के सिवाय सब कुछ वही रहे, यथावत, तो क्या पेपर लीक की समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या पेपर्स लीक ग़लत है पर क्या वही शिक्षा की सारी समस्याओं की जड़ है? गौर करने की बात है। पेपर का लीक होना कोई स्वतंत्र समस्या नहीं है। आज कोई तत्काल कमाई करने के लिए तो कोई भविष्य की कमाई की राह बनाने के लिए ईमानदारी को बिना किसी संकोच के तिलांजलि दे रहा है। इसी के समानांतर पैसा देकर नौकरी देने और पाने की चेष्टा भी हो रही है। रुपया लेकर काम यानी सुविधा-शुल्क जग जाहिर बात है। जाने कितने आफिस ऐसे हैं जहाँ बिना किसी तरह के सिफारिश या घूस या दोनों के बिना कोई कागज टस से मस नहीं होता ।

धन के अवैध यातायात के साथ न्यायालय का बड़ा घनिष्ठ रिश्ता है इसके कई उदाहरण आ चुके हैं। न्याय कितनी मुश्किल और कितनी मंहगी प्रक्रिया से होता है वह कोर्ट के दरवाजे जाने वाले से पूछिए । क़ानूनी प्रक्रियाओं का हाल ऐसा है कि उनके उलझन में कोई राह नहीं मिलती। प्रतिदिन राजनीतिप्रेरित कितने मुकदमे चलते हैं और कितने बरी हो जाते हैं, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है। फ़ास्ट ट्रैक की कचहरी किन-किन चीजों के लिए लगेगी? रसूख़ वाले और पैसेदार नेताओं और अनय लोगों के मुक़दमों की गिनती ही नहीं होती। उनके पास साधनों की कमी है, जबकि आम जन उसमें पिसने के लिए मजबूर हैं। पर यह सब वर्तमान चर्चा में सीधे-सीधे प्रासंगिक नहीं है।

शिक्षा ही विकास का मूल है और इसी से आत्म-निर्भरता भी आएगी पर इसके लिए शिक्षा को स्वायत्तता देनी होगी और शिक्षकों पर भरोसा भी करना होगा। शिक्षा के मार्ग में अनेक समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं। शिक्षा की जो विसंगतियां मुँह बाये खड़ी हैं उसके लिए जंतर मंतर की राजनीति से ही काम नहीं चलेगा । आठ दशक से उपनिवेश की हैसियत से स्वतंत्र हुए देश में पाश्चात्य शिक्षा पर ही हम आश्रित बने हुए हैं। अब नवउदारवाद की गुलामी का शिकंजा कसा जा रहा है । यह अच्छी बात है कि हमारे मान्यवरों की नींद टूटी है और उनकी दृष्टि में शिक्षा आ रही है। इसलिए शिक्षा की पीड़ा को उन्हें याद दिलाना ठीक होगा। यहाँ संक्षेप में प्रमुख मुद्दों का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है।

आज शिक्षा का बुनियादी ढांचा कमजोर हो रहा है। शिक्षा महंगी होती जा रही है। शिक्षा में सृजनात्मकता की जगह आज भी रटने पर ही ज़ोर है। हमारी शिक्षा का संस्कृति और मूल्य से रिश्ता कमजोर है। कोचिंग का व्यापार तेजी से उठान पर है। कोचिंग संस्थान की की और नज़र तब जाती है जब कोई दुर्घटना होती है परंतु देश के राष्ट्रीय दैनिक अखबारों के मुख पृष्ठ आए दिन इनके विज्ञापनों से सुशोभित होते हैं। स्कूल कॉलेज में दाखिला महाभारत से कम नहीं होता। दाखिले से लेकर परीक्षा तक की यात्रा हर आम आदमी के लिए युद्ध का मोर्चा बना हुआ है।

विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की कमी वर्षों से बनी हुई है । शिक्षा को बजट में कभी भी वायदे के मुताबिक छह प्रतिशत का हिस्सा नहीं मिल पाता जिसके कारण शिक्षा-संस्थानों में सुविधाओं का लगातार अभाव बना हुआ है। अमीरी-गरीबी का भेद शिक्षा की दुनिया में बेतहाशा बढ़ता जा रहा है जहाँ प्राइमरी स्तर पर मुफ्त से लेकर हजारों रूपये महीने की फ़ीस वाले स्कूल चल रहे हैं। इसे ही निजी विश्वविद्यालय मनचाही फीस वसूल रहे हैं। शिक्षा पर ईमानदारी के साथ अपनी जमीन खड़े होकर समाधान खोजने की जरूरत है।