Indian Culture: भारत की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपराएं सभ्यतागत निरंतरता का आधार: गजेंद्र सिंह शेखावत
Indian Culture: आईजीएनसीए एवं एएसआई के सहयोग से पुस्तक ‘टाइमलेस इंडिया: प्रोटेक्शन एंड रिवाइवल ऑफ इंडियन कल्चरल आइडेंटिटी अंडर द लीडरशिप ऑफ प्राइम मिनिस्टर नरेन्द्र मोदी’ लॉंच की गई
By PIB Delhi: Indian Culture: भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण, स्मारकों के पुनरुद्धार और राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति पर परिचर्चा को रेखांकित करते हुए, आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सहयोग से टाइमलेस इंडिया: प्रोटेक्शन एंड रिवाइवल ऑफ इंडियन कल्चरल आइडेंटिटी अंडर द लीडरशिप ऑफ प्राइम मिनिस्टर नरेन्द्र मोदी पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक आईजीएनसीए और सुभी पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित एवं तरुण विजय द्वारा संपादित की गई है।
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📲 WhatsApp पर शेयर करेंयह कार्यक्रम धरोहर भवन, एएसआई, मंडी हाउस, नई दिल्ली में आयोजित हुआ, जिसमें केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने विशिष्ट अतिथि (गेस्ट ऑफ ऑनर) के रूप में शिरकत की। पूर्व राज्यसभा सांसद एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने मुख्य भाषण दिया। इस सत्र की अध्यक्षता सांस्कृतिक विचारक डॉ. अनिल गोयल ने की।
स्वागत भाषण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक वाई. एस. रावत द्वारा दिया गया। उद्घाटन भाषण साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ आर्ट्स, मीडिया एंड डिजाइन के डीन प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौड़ ने दिया। पुस्तक के लेखक व संपादक, प्रख्यात पत्रकार एवं पूर्व राज्यसभा सांसद श्री तरुण विजय ने पुस्तक की विषय-वस्तु और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के कला निधि विभाग के प्रमुख प्रो. के. अनिल कुमार ने प्रस्तुत किया।
केंद्रीय संस्कृति (Indian Culture) एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में सिमटी कोई इकाई नहीं है, बल्कि यह हज़ारों वर्षों की निरंतरता, ज्ञान, साधना, संघर्ष और अनुभव से निर्मित एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना सदियों से अनवरत बहती आ रही है। भारत ने संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से दुनिया भर की सभ्यताओं के साथ संबंध स्थापित किए हैं। इसकी ज्ञान परंपराओं, स्थापत्य विरासत और सांस्कृतिक धरोहर ने दुनिया भर के देशों को आकर्षित किया है।

उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीयों के मन में अपनी सभ्यता, (Indian Culture) संस्कृति और परंपराओं के प्रति गर्व की भावना को कमजोर करने के प्रयास किए गए। इसने भारतीयों द्वारा अपनी ही ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक आदर्शों को देखने के नजरिए को भी प्रभावित किया। भारतीय सभ्यता की विशिष्ट विशेषता यह है कि यह भविष्य की ओर बढ़ते हुए भी अपने अतीत से प्रेरणा लेने की क्षमता रखती है। भगवान राम और भगवान कृष्ण द्वारा प्रस्तुत आदर्शों के साथ-साथ ऋषियों, विचारकों और ज्ञान-साधकों की परंपराएं आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस पुस्तक की सराहना की और इसके संपादक, सांस्कृतिक विचारक, लेखक तथा वरिष्ठ पत्रकार तरुण विजय की प्रशंसा की, जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने और उसे पुनर्जीवित करने के महत्व को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण प्रकाशन सामने लाया है।
डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति और इसकी कालातीत यात्रा को समझने के लिए इसकी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता और गर्व की भावना का होना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्वतंत्रता के बाद एक लंबे समय तक भारतीय संस्कृति के बारे में खुलकर बोलने में एक अनावश्यक झिझक रही, जिससे औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त होना कठिन हो गया था। टाइमलेस इंडिया जैसी पुस्तकें भारत की सांस्कृतिक निरंतरता और भारतीयता के मूल तत्व को समझने का अवसर प्रदान करती हैं।

मार्क्स टली की पुस्तक नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया का उल्लेख करते हुए, उन्होंने भारतीय मानस की एक विशिष्ट विशेषता की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय मन आम लोगों की आस्था को कमजोर करने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उनके विश्वासों और जीवंत अनुभवों को समझने की कोशिश करता है। भारतीय सभ्यता की यात्रा निरंतरता, संवाद और परिवर्तन की रही है, और इसे किसी एक निष्कर्ष या सीमित दृष्टिकोण में नहीं बांधा जा सकता।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पुस्तकों के प्रकाशन और संरक्षण के साथ-साथ पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति (Indian Culture) को केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे शिक्षा और दैनिक जीवन का हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने और भारतीय जीवन व संस्कृति से जुड़ी सामग्री को छात्रों तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने आगे कहा कि भारत की कालातीत सांस्कृतिक यात्रा को एक उपयुक्त दृष्टिकोण से समझना और शिक्षा प्रणाली को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करना वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं।
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अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. अनिल गोयल ने कहा कि भारत एक प्राचीन सभ्यता और एक ऐसी सांस्कृतिक चेतना है, जो हज़ारों वर्षों से बहती आ रही एक जीवंत परंपरा से निर्मित हुई है। अनेक आक्रमणों और परिवर्तनों के बावजूद, भारत की सांस्कृतिक आत्मा जीवित है। इसके मंदिर, स्तूप, किले, मूर्तियां और शिलालेख केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के ज्ञान, कला, विज्ञान, आस्था और दर्शन के जीवंत प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि धरोहरों का संरक्षण राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक निरंतरता और भावी पीढ़ियों के प्रति एक जिम्मेदारी है।
उन्होंने तथ्यों और साक्ष्यों के माध्यम से भारतीय इतिहास को समझने और भूली बिसरी उपलब्धियों को सामने लाने की आवश्यकता पर जोर दिया। औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त होकर सांस्कृतिक विरासत को समझने के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि किसी देश का आकलन उन मापदंडों के आधार पर किया जाना चाहिए जो उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं को दर्शाते हों। विकास और विरासत, आधुनिकता और परंपरा, तथा विज्ञान और संस्कृति परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। टाइमलेस इंडिया जैसी पुस्तकें भारत की सभ्यतागत निरंतरता और सांस्कृतिक विरासत की समझ को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस अवसर पर, विद्वानों, इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने टाइमलेस इंडिया के माध्यम से भारत की सभ्यतागत निरंतरता, सांस्कृतिक विरासत और उसकी ऐतिहासिक थाती के संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला।
स्मारक संरक्षण और सांस्कृतिक स्मृति पर केंद्रित एक पुस्तक
टाइमलेस इंडिया राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति के आसपास की परिचर्चा के साथ-साथ, भारत की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने और पुनर्जीवित करने में स्मारकों की भूमिका का पता लगाती है। यह शीर्षक भारत की उस सांस्कृतिक निरंतरता की ओर इशारा करता है, जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों, स्थापत्य परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के रूपों के माध्यम से स्पष्ट बनी हुई है।
यह पुस्तक स्मारक संरक्षण और “राष्ट्र की स्मृति के उपनिवेशीकरण से मुक्ति” के विचार को विशेष महत्व देती है। यह दृष्टिकोण भारत की सांस्कृतिक विरासत को उसके अपने ऐतिहासिक अनुभवों, परंपराओं और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के माध्यम से समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
इस विमोचन ने इस प्रकाशन को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और इसके इर्द-गिर्द की परिचर्चा को व्यापक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम ने संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व और सांस्कृतिक अध्ययन पर संवाद को आगे बढ़ाने का अवसर भी प्रदान किया।

