New Year-2026: राष्ट्रीय नवोन्मेष और विकसित भारत की संकल्पना: गिरीश्वर मिश्र
New Year-2026: पिछले एक दशक में भारत की छवि निश्चित रूप से एक सशक्त देश के रूप में निखरी है। नए वर्ष में इस बदलते भारत के भविष्य के बारे में सोचते हुए हमें देश की समृद्ध प्राचीन सभ्यता और आधुनिक राष्ट्र राज्य की संकल्पना दोनों को ध्यान में रखना होगा। लोक की स्मृति में अभी भी नैतिक और न्यायपूर्ण शासन के लिए राम-राज्य की अमिट छवि क़ायम है। न केवल 1950 में लागू भारत के संविधान की मूल प्रति में मौलिक अधिकारों वाले अध्याय के आरंभ में राम का चित्र अंकित किया गया था बल्कि 2025 में अक्टूबर तक 22 करोड़ लोग अयोध्या में राम लला के दर्शन कर चुके हैं। साल के अंत तक यह संख्या 50 करोड़ हो सकती है।
इसलिए जहाँ वैश्वीकरण के अनुकूल आकांक्षाओं को ध्यान में रखना होगा वहीं नैतिकता, सत्य तथा अहिंसा जैसे मानदंडों की भी चिंता करनी है। राम-राज्य धर्म का राज्य की संकल्पना है जिसमें समता, समानता और सौहार्द के साथ सबका हर तरह से कल्याण मुख्य लक्ष्य है। देश की प्रगति की कथा को देखें तो उसमें निरंतरता और परिवर्तन दोनों के तत्व मिलते हैं। आज हमें संयत हो कर यह विचार करना होगा कि विकसित भारत कैसा होगा ? यह प्रश्न इसलिए भी जरूरी हैं कि भारतीय समाज में अनेक प्रकार की बहुलताएँ हैं जिसे लेकर कुछ विचारक देश की मौलिक एकता को प्रश्नांकित करते हैं।

वे भूल जाते हैं कि भारतीय दृष्टि में बहुलता अंतर्निहित मौलिक एकता का ही प्रकटन होती है – एकम् सद् विप्रा: बहुधा वदंति । उसी एकता को खोजना पहचानने का उद्देश्य होना चाहिए। यही सात्विक ज्ञान है जैसा गीता में कहा गया है – अविभक्तम् विभक्तेषु य: पश्यति स पश्यति यानी बंटे हुओं में वह तत्व जो अनबंटा रहते हुए सब में मौजद रहता है उसे देखना चाहिए । पूरे प्राणी जगत में निकटता को आधार बना कर विविधताओं का सह अस्तित्व और पारस्परिक संवाद इस भारत की मौलिक सोच रही है।
ऐसे में दूसरा या अन्य अनन्य (गहरा दोस्त!) हो जाता है। तब दूसरा या ‘पर’ हमारे अपने स्व या आत्म का हिस्सा या ‘अपर’ हो जाता है। हम दूसरे का आदर करते हैं और अपरिचित को अतिथि देवता के रूप में पूजते हैं । यह अकारण नहीं है कि परिवार या कुटुंब का रूपक हमारी सोच में केंद्रीय है। सबको शामिल करते हुए वसुधैव कुटुंबकम् के लक्ष्य को अपनाते हुए ही विविधता में समरसता स्थापित हो सकेगी । देश की एकता, देश को अपनाने के भाव और देशप्रेम के लिए भी यह दृष्टि जरूरी है।
भविष्य पर गौर करते हुए ताजे अनुभवों पर ध्यान देना ठीक होगा। बीता वर्ष भारत के लिए चुनौतियों भरा था। अमेरिकी नीति ने भारत के निर्यात, रुपये की कीमत, निवेश तथा भुगतान संतुलन आदि को लेकर मुश्किलें खड़ी कर दीं। राष्ट्रपति ट्रम्प की तथाकथित अमेरिकी हितों को आक्रामक ढंग से आगे धकेलने की नीति ने निश्चित ही व्यापारिक दृष्टि से अहित किया। अमेरिका द्वारा पारस्परिक सीमा शुल्क अर्थात् 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का निर्णय लिया गया । इन सब को देखते हुए स्थिति को संभालने के लिए भारत ने कई कदम उठाए गए। जी एस टी की दरें कम की गईं और श्रम कानून में बदलाव लाया गया ।
यह बड़ी उपलब्धि है कि अंतर्राष्ट्रीय अनिश्चितिता की विकट परिस्थितियों में भी भारत की जी डी पी की दर विश्व में अव्वल दर्जे की बनी रही । खुदरा मंहगाई दर भी आठ साल में सबसे कम रही । अच्छी पैदावार, आपूर्ति- श्रृंखला में सुधार, कच्चे तेल की कम कीमत ने इस परिस्थिति में मदद की। शेयर बाजार में घरेलू निवेशक हमारी अर्थ व्यवस्था की ताकत बने। आयकर रिटर्न के दाख़िलों और कर-संग्रह में भी सुधार हुआ । कई देशों के साथ व्यापार समझौते भी किए जा रहे हैं। बिजली, शहरी विकास, खनन, और वित्तीय सेवा के क्षेत्र में नई पहलें की गईं । भारत एक बड़ी वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की राह पर अग्रसर है और अनुमान है कि 2030 तक 7.3 ट्रिलियन डालर जी डी पी के साथ वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा।
आशा की जाती है कि आर्थिक उन्नति से आम जनों का जीवन स्तर ऊँचा उठेगा। सामाजिक संरचना की दृष्टि से मध्यम वर्ग का आकार बढ़ रहा है जिससे खपत और शहरीकरण में वृद्धि और ग़रीबी में कमी के आसार बन रहे हैं। देश में बुनियादी ढांचा विस्तृत और सुदृढ़ हो रहा है। खास तौर पर डिजिटल प्रौद्योगिकी, कृत्रिम मेधा (ए आई), अंतरिक्ष विज्ञान, मेट्रो और बुलेट ट्रेन आदि को लेकर प्रगति दर्ज हो रही है। मेड़ इन इंडिया के तहत मैन्युफैक्चरिंग, आईटी, स्वास्थ्य सेवा और स्टार्टअप्स में भारी वृद्धि से रोजगार के नए अवसर बढ़ रहे हैं ।
उत्पादन क्षेत्र में प्रगति की संभावना दिख रही है और स्वदेशी विकास की नीति अपनाई जा रही है। अनुमान है कि 5-जी और रोबोटिक्स के उपयोग का दायरा विस्तृत होता जायेगा। व्यापारिक लेनदेन अधिकाधिक ‘कैशलेस’ होते जाएँगे। अब ऑनलाइन ख़रीददारी और ओ टी टी प्लेटफॉर्म तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं । भविष्य में ए आई का प्रभुत्व और भी बढ़ेगा । उसी के साथ साइबर अपराध भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा बड़ा महत्वपूर्ण सरोकार बन रहा है ।
इन सबके साथ यह भी याद रखना जरूरी है कि देश का भविष्य सिर्फ आर्थिक उन्नति के सूचकों तक सीमित नहीं किया जा सकता। आर्थिक विकास को केवल वृद्धि दर के अर्थ में ही नहीं, बल्कि रोजगार के अधिक अवसर, सामाजिक गतिशीलता और आम जनों के जीवन-स्तर में उन्नति के संदर्भ में भी देखना होगा। जनसंख्या का विशाल आकार और सबके लिए गुणवत्तापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है। इस हेतु हमारी अर्थव्यवस्था को ज्ञान-केंद्रित और सामाजिक रूप से ज्यादा उत्तरदायी भी बनाना होगा। आत्मनिर्भर भारत के लिए अवसर भी है पर हमें अपनी सीमाओं को भी नजर अंदाज़ नहीं कर सकते।
उदाहरण के लिए युवा भारत को अक्सर एक पूंजी के रूप में घोषित किया जाता है पर इसके लिए कौशल, स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश करना होगा। कौशल विकास की कमी और युवाओं में बेरोज़गारी के चलते समाज में असंतोष पैदा हो रहा है। यद्यपि नई शिक्षा नीति के दस्तावेज में अनेक प्राविधान हैं पर उसकी विसंगतियों को दूर कर उनके कार्यान्वयन के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। उपेक्षा और साधनों के अभाव में स्कूलों, महाविद्यालयों और विद्वविद्यालयों में शिक्षा की व्यवस्था में गिरावट चिंताजनक है। शिक्षा की पहुँच, उसकी गुणवत्ता और प्रासंगिकता को लेकर संशय बना हुआ है। इसी तरह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की मुश्किलें भी बढ़ी हैं। मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी सुविधाएँ पर्याप्त नहीं हैं।
अभी भी महिला श्रम-भागीदारी निम्न दर पर है। विकास रोजगार-रहित या अल्प-रोजगार वाला हो रहा है, आय और संपत्ति की असमानता भी बढ़ी है और अनौपचारिक क्षेत्र की असुरक्षा बनी हुई है। साथ ही जाति, वर्ग, लिंग और क्षेत्रीय विषमताएँ भी हैं। उनको दूर कर बहिष्कृत जनों का समावेश जरूरी होगा अन्यथा राजनैतिक दलों द्वारा सामाजिक ध्रुवीकरण कर चुनावी लाभ लेने का चक्र चलता रहेगा। हमें बहुलता और राष्ट्रीय एकता को जोड़ना आवश्यक है। देश की सांस्कृतिक विरासत का स्वागत-संवर्धन और वैश्वीकरण के आकर्षण के बीच भी तनाव है जिसका समाधान जरूरी है ।
यह भी उल्लेखनीय है कि देश की सीमाओं पर विदेशी आतंक और अस्थिरता लाने वाले देशी तत्वों की ओर से लगातार चुनौती आती रहती है। इस सिलसिले में आपरेशन सिन्दूर ने भारत की श्रेष्ठ स्तर की सामरिक तैयारी और अचूक मारक क्षमता का परिचय दिया। दुर्भाग्यवश कई पड़ोसी देशों की राजनैतिक अस्थिरता और उथल-पुथल को देखते हुए सतत चौकसी और सावधानी की जरूरत बनी हुई है। साथ ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से होने वाली अंतरराष्ट्रीय दखल परिस्थति को और जटिल बना रही है। आज विभिन्न देशों के समीकरण सीमित हितों को लेकर बन बिगड़ रहे हैं। यह मानवीय दुख है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध अब चौथे साल में प्रवेश करेगा। संहार के बाद गाजा पट्टी की स्थिति दयनीय है। ईरान और इजरायल के बीच भी तनातनी जारी है।
आज डिजिटल प्रौद्योगिकी की क्रांति प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक संबंधों समेत जीवन के हर हिस्से को नए ढंग से परिभाषित कर रही हैं। चुनौती है यह कि तकनीक को दक्षता का लाभ लेते हुए नैतिकता और मानवीय गरिमा के मूल्यों को कैसे सुरक्षित और संबर्धित किया जाय। डिजिटल रूप से सारे समाज का समावेश, डेटा विषयक नैतिकता और साइबर अपराध भारी चुनौती पेश कर रहे हैं। इसी तरह प्राकृतिक आपदाओं से मिलते संकेत जलवायु-परिवर्तन और तापमान में लगातार वृद्धि जैसे बदलाव पर्यावरणीय संकट की जटिलता को बता रहे हैं।
भविष्य के लिए ये गहन चुनौतियाँ होंगी। गौरतलब है कि भारतीय ज्ञान परम्परा और मूल्य दृष्टि प्रकृति के साथ संतुलन और सह जीवन पर बल देती आई है। वह प्रकृति के अंधाधुंध दोहन के विरुद्ध है। हमें अनिवार्य रूप से उपभोक्तावाद पर लगाम लगाते हुए ऐसी जीवन-शैली अपनानी होगी जो पर्यावरण और सतत विकास के विरुद्ध न हो।
भारत का भविष्य उज्ज्वल और संभावनाओं से भरा है, जो एक युवा आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, और तकनीकी प्रगति से अनुप्राणित है; हालाँकि, इसे गरीबी, जलवायु परिवर्तन, और सामाजिक असमानताओं जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। इन्हें दूर करने के लिए नवाचार और समावेशी विकास की आवश्यक है। यह भी जरूरी होगा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बढ़े और सामाजिक संवाद तथा सहिष्णुता को बढ़ावा मिले। इसके लिए भागीदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के अभ्यास पर व्यावहारिक स्तर पर बल देना होगा।–


