IIT BHU Research: आई आई टी बी एच यू के शोध कर्ताओं की खोज को मिली वैश्विक प्रतिष्ठा
IIT BHU Research: हरे नारियल के रेशे का बायोचार: लौह प्रगलन प्रक्रियाओं में एक टिकाऊ विकल्प
- IIT BHU Research: आईआईटी (बीएचयू) के शोधकर्ताओं का अभिनव अध्ययन ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ वेस्ट मैनेजमेंट’ (Impact Factor: 7.1) में प्रकाशित
रिपोर्ट: डॉ राम शंकर सिंह
वाराणसी, 21 जनवरी: IIT BHU Research: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. गिरिजा शंकर महोबिया एवं उनकी टीम (डॉ. विश्वजीत मिश्रा, रेहान सचान और डॉ. एल.एस. राव) ने हरे नारियल के छिलके से बने बायोचार (Green Coconut Husk Biochar, GCB) को लौह निर्माण (Ironmaking) प्रक्रियाओं में अपचायक (Reducing Agent) के रूप में उपयोग करने की संभावनाओं का सफल परीक्षण किया है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित Waste Management जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
शोध का महत्व
इस्पात उद्योग विश्व स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन का लगभग 7% और भारत में 12% तक योगदान करता है। भारत ने 2070 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य और 2030 तक 20% उत्सर्जन कटौती का संकल्प लिया है। ऐसे में जीवाश्म ईंधन के स्थान पर स्थानीय एवं नवीकरणीय बायोमास-आधारित अपचायकों का उपयोग, इस लक्ष्य की दिशा में एक ठोस कदम है।
नारियल अपशिष्ट का अभिनव उपयोग
भारत दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है (2021-22 में 19,247 मिलियन नारियल)। इससे बड़ी मात्रा में अपशिष्ट (खोल व भूसी) उत्पन्न होता है, जिसे अब तक पर्याप्त औद्योगिक उपयोग नहीं मिल पाया था।
प्रो. महोबिया की टीम ने पाया कि –
GCB पारंपरिक नॉन-कोकिंग कोयले के समान अपचयन क्षमता प्रदर्शित करता है। प्रारंभिक 60 मिनट में इसकी अपचयन दर अधिक तेज़ रही, जिससे प्रक्रिया की दक्षता बढ़ सकती है। इसमें राख और सल्फर की मात्रा कोयले की तुलना में काफी कम है, जिससे स्पंज आयरन की गुणवत्ता में सुधार और स्लैग निर्माण में कमी संभव है। यह पूरी तरह नवीकरणीय और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अपशिष्ट से निर्मित है, जिससे परिवहन व पर्यावरणीय लागत घटती है।

आर्थिक परिप्रेक्ष्य
GCB की उत्पादन लागत लगभग ₹10,000-16,000 प्रति टन अनुमानित है, जबकि नॉन-कोकिंग कोयला ₹546-3,460 प्रति टन उपलब्ध है। किंतु, GCB के पर्यावरणीय लाभ, बेहतर प्रतिक्रिया दर और गुणवत्ता सुधार इसकी लागत को सार्थक ठहराते हैं। इसे पूर्ण विकल्प के बजाय कोयले के मिश्रण (Blended Use) में अपनाने से उत्सर्जन कम करने का व्यावहारिक मार्ग खुलता है।
संस्थान के निदेशक, प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि आईआईटी (बीएचयू) के शोधकर्ता सतत और स्वच्छ तकनीकों पर कार्य कर रहे हैं। यह अध्ययन न केवल इस्पात उद्योग के लिए एक संभावित गेम-चेंजर है, बल्कि भारत की नेट ज़ीरो 2070 की प्रतिबद्धता को सशक्त बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान है। हरे नारियल के छिलकों से निर्मित बायोचार, लौह एवं इस्पात उद्योग में जीवाश्म-आधारित अपचायकों के विकल्प के रूप में एक टिकाऊ, स्वच्छ और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। इस नवाचार से इस्पात उत्पादन की कार्बन तीव्रता घटाने और हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति सुनिश्चित हो सकती है।


